Unemployment Crisis- private vs government.

private service is not a service, why?

भारत में सरकारी रोजगार एक अमूल्य लक्ष्य क्यों बनता जा रहा है, इसके पीछे सरकारी तंत्र की असफलता या सामाजिक विचारधारा हैं। निजी क्षेत्रों में कार्य करना रोजगार नहीं हो सकता क्योंकि सरकारी तंत्र के नियमन का संचालन होता ही नहीं है। वास्तविकता में एक स्नातक का छात्र अपने भविष्य की शुरुआत 10,000 रुपयों से नहीं करना चाहता वही सरकार का नियमन 19,750 रुपयों का है, परंतु निजी क्षेत्र कभी भी इन नियमों का पालन क्यों नहीं करते इसका जिम्मेदार कौन है। सरकार या बेरोजगारी का अत्यंत भयावह चक्र।

Government service is a service?

भारत में केवल 33 प्रतिशत शहरीकरण हो सका है।

ग्रामीण क्षेत्र से आने वाला युवा कितना भी योग्य हो उसे एक सरकारी नौकरी की तलाश ही रहती है क्योंकि सरकारी तंत्र में ही वेतन वृद्धि बाजार वृद्धि के अनुसार होती है और एक सुखद,सामाजिक और सभ्य जीवन व्यतीत करने के लिए आय का स्रोत बाजार के अनुसार कार्य करना चाहिए।

सरकारी तंत्र के अत्यंत शिथिल हो जाने के कारण लाई गई योजनाओं का नियमन नहीं हो पाता और निजी क्षेत्र कामगारों को अत्यंत कम मूल्य में कार्य करवाना चाहते हैं। जिस कारण सरकारी क्षेत्र और निजी क्षेत्र में नौकरियों का इतना बड़ा अंतर समझ आता है। तात्कालिक सरकार चाहती है आत्मनिर्भर बनो परंतु आत्मनिर्भरता हर व्यक्ति के अंदर विचारों से नहीं आ जाती, निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अमीर गरीब की खाई को निरंतर बढ़ा रही हैं। निजी क्षेत्र वाले अत्यंत लाभ कमाना चाहते हैं परंतु कामगारों को कम से कम कीमत देना चाहते हैं और चौंकाने वाला नतीजा यह है कि उन्हें कामगार भी मिल जाते हैं। यह बेरोजगारी के कारण ही हो रहा है।

तात्कालिक सरकार ने अत्यंत ओजस्वी भाषणों के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने के कई वादे किए थे। सरकारी तंत्र संभालने के बाद सरकार ऊपर से काम कर रही है परंतु जमीन स्तर पर कोई कार्य पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं हो रहा है ।

निजी क्षेत्रों को बढ़ावा देने के साथ-साथ सरकारी तंत्र को उसके नियमन, उसकी वेतन प्रणाली,कामगारों को योग्यता के अनुसार काम अन्य प्रक्रियाओं पर नियंत्रण करना होगा;अन्यथा युवा देश का भविष्य नहीं देश के लिए बोझ हो जाएगा।

U P government and theirs system

उत्तर प्रदेश में रोजगार की पंचवर्षीय योजनाएं चलती हैं, उन पंचवर्षीय योजनाओं को वार्षिक योजनाओं में अगर बदल दिया जाएगा तब मुफ्त देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। अधिकतर सरकारी तंत्र ऊपर से दबाव डालकर नीचे के कचरे को ढकना चाहती हैं। सरकारी तंत्र में आउट सोर्स सेवा प्रणाली बंद करके भर्तियों की प्रणाली को तीव्र और पारदर्शी कर देने से बेरोजगारी दर में नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। जब भी इन मुद्दों को सार्वजनिक मंचों में उठाया जाता है तो उन्हें गंभीर ना मानकर बाद में निस्तारण करने की प्रक्रिया में डाल दिया जाता है। आप विकास के तीव्र पहियों को दौड़ आना चाहते हैं, बिचौलियों को बंद करवाना चाहते हैं। आप कांट्रैक्ट बेस पर नौकरियां उपलब्ध कराते हैं,जिसमें सरकार ही कांट्रेक्टर को पैसा देती है और कामगार को सिर्फ 10000 से 15000 में काम करवाया जाता है। यह सरकारी तंत्र की नाकामियों का ही नतीजा है।

संक्षेप में, कम योजनाओं और तीव्र नियमन से ही इस गंभीर समस्या का निवारण हो सकता है।

Trying to be positive before getting negative!!

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