अत्याधिक पिछड़े ग्राम बनें अत्याधुनिक- ग्रामीण विकास का स्वरुप प्रस्तुत करते सुखोमाजारी तथा मंडाली गांव

सूखोमाजारी गांव

  • जनसंख्या- 600
  • प्रति व्यक्ति आय- 3000-5000/माह
  • क्षेत्रफल-4.21 वर्ग किलोमीटर
प्राकृतिक और आर्थिक रूप से हुआ खुशहाल गांव सुखोमजारी एक अत्यन्त छोटा गांव है जहां पर 600 लोग जनसंख्या के आधार पर 400 हेक्टेयर क्षेत्र में निवास करते हैं। चंडीगढ़ से 40 किलोमीटर दूर सुखोमाजरी  80 घरों का शिवालिक की तलहटी में बसा अत्यंत पिछड़ा गांव  जिसका पुनरुद्धार 1980 के दशक में हुआ। वृक्षों तथा अत्यन्त उपयोगी लकड़ियों की उपस्थिति के बावजूद इसका विकास नहीं हो पा रहा था। इनकी प्रति व्यक्ति आय 100 से 500 रुपए प्रति महीना थी।
           प्राकृतिक रूप से समृद्ध गांव सुखोमजारी को P.R.Mishra ( परशुराम मिश्रा,एक वर्षा जल प्रबंधनकर्ता तथा मृदा संरक्षक चंडीगढ़ विश्वविद्यालय) ने वर्षा जल संरक्षण प्रबंधन तंत्र स्थापित करनेे के लिए चुना 1980 में वर्षा जल तंत्र स्थापित होने के बाद सुखो मझारी गांव के विकास की धारा अनवरत चल पड़ी वर्षा जल के संचयन से सुखो मझारी गांव मेंमुंगेली की कृषि  तथा कत्था एवं अन्य पहाड़ी उपज तीव्र गति से होने लगी जिससे गांव की प्रतिव्यक्ति आय केवल 5 वर्षों में 3000 प्रति महीना हो गयी  यहां की मुख्य उपज पहाड़ी भाब्बर  घास की बिक्री आयकर के अंतर्गत पहाड़ी संसाधन प्रबंधन समिति के द्वारा 1989 में अधिकृत करा दिया  गया भाबर घास की प्रमुख खरीद कागज मिल के द्वारा की जाती थी। सुखो मजारी गांव में अब उसके पास के धमाला गांव के मध्य  भाबर घास की कृषि उन्हें दिन प्रतिदिन खुशहाल बनाती जारही है।                                 जैसा बोओगे वैसा काटोगे की कहावत को चरितार्थ करते हुए ग्रामीणों ने प्रकृति को खुश किया, प्रकृति ने उन्हें खुश कर दिया। ग्रामीणों की मेहनत से गांव खुशहाल हो गया  परंतु तत्कालिक निष्क्रियता के कारण गांव के विकास में अवरोध आने लगे और सुखोमाजरी   विकास प्रक्रिया असफल होती दिख रही है।
         

मंडाली गांव अगले आर्टिकल में……..

Trying to be positive before getting negative!!

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